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Maharajadhiraj Harshvardhana
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Maharajadhiraj Harshvardhana

महाराजाधिराज हर्षवर्धन-सफर एक सम्राट से संन्यासी तक' यह कहानी एक ऐसे शासक की संघर्षमयी जीवनयात्रा का बखान करती है जो असीम शौर्य-त्याग-प्रतिभा-दानवीरता-धार्मिक उदारता के लिए विश्वविख्यात है। युवावस्था में विदेशी हूणों के विरुद्ध सफल विजयी अभियान चलाने वाले इस महान योद्धा को अपने जीवन के आरंभ काल में विरह-वियोग का कष्टप्रद सामना करना पड़ा था। उत्तरापथ के स्वामी सम्राट हर्ष ने अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर एक विशाल साम्राज्य का निर्माण किया था। कन्नौज और प्रयाग में विशाल धर्मसभा तथा महाकुंभ का आयोजन कर अपनी विद्वत्ता-धार्मिक उदारता-शालीनता तथा दानवीरता का भी श्रेष्ठ परिचय दिया था। तथागत भगवान् बुद्ध के जीवन से वे अत्यधिक प्रभावित थे। वे नालंदा विश्वविद्यालय के प्रमुख संरक्षक थे। चीनी यात्री ह्येनसांग, कवि बाणभट्ट और मयूर जैसे विद्वानों का अपने दरबार में सम्मान किया था। प्रयाग के महादानकुंभ में अपनी सारी संपत्ति दान करने के बाद उन्होंने बहन राज्यश्री के साथ संन्यास दीक्षा ली थी और तपस्या के लिए वन में चले गए थे। प्रस्तुत उपन्यास में शौर्य-प्रेम-विरह-ज्ञान-दान-वैराग्य आदि गुणों से ओतप्रोत एक दिग्विजयी सम्राट का संन्यासी बनने तक का अद्भुत सफर लेखक ने अपनी सुलभ-सुगम भाषाशैली से चित्रित किया है।

ISBN
9788119263042
Språk
Hindi
Vekt
310 gram
Utgivelsesdato
24.4.2023
Antall sider
206