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Dharamputra (Edition1st)
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Dharamputra (Edition1st)

""यदि मैं भारत, ब्रिटेन, अमेरिका तथा धुरी राष्ट्रों समेत शेष संसार को अहिंसा की ओर ले जा सकता, तो मैं ऐसा कर डालता; पर यह चमत्कार तो केवल परमात्मा के हाथ में है। अब मेरे हाथ तो केवल यही है, कि करूँ या मरूं। आपको पत्नी-परिजनों का मोह त्याग देना होगा। संसार में सब कुछ छोड़ देना होगा। मैं चाहता हूँ, कि अब विरोधी अंग मिलकर भारत को विदेशी शासन से मुक्त कर लें, चाहे इसके लिए उन्हें कितना भी मूल्य क्यों न चुकाना पड़े, उनका एक ही उद्देश्य होगा-ब्रिटिश सत्ता को पदश्वष्ट करना। मैं एक अस्वाभाविक प्रभुत्व का रक्तहीन अन्त करके एक नवीन युग का आरम्भ करना चाहता हूँ। यह हमारा अन्तिम संग्राम है और इसमें दो महीने से अधिक समय न लगेगा। परन्तु लाखों मनुष्यों को एक साथ आगे बढ़ना होगा और भारत दासता की जिन जंजीरों से बंधा है, उन्हें तोड़ना होगा। हमारे संघर्ष में वे सभी कार्य सम्मिलित होंगे, जिनसे वह शीघ्र एक दुर्वमनीय शक्ति का रूप धारण कर ले। संक्षेप में मैं कहूँगा-करो या मरो।"" - इसी पुस्तक से
ISBN
9789356826182
Språk
Hindi
Vekt
310 gram
Utgivelsesdato
14.3.2024
Antall sider
146