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?????? (Sipiyan)

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पुस्तक का परिचयसीपियाँ एक कोशिश है, ज़िदंगी की भागदौड़ के बीचों-बीच आधे छुपे, आधे ढके यथार्थ से, रूमानी साक्षात्कार की । जब भी सच से आंखें दो-चार हुई, कभी घबराकर, कभी शर्म से, नज़रें चुरा ली और बंद आंखों ने देख डाले अनगिनत ख्वाब । यही ख्वाब हमसफ़र रहे हैं, बेचैन रातों में बादलों से लुका-छिपी खेलते चांद के। ऐसे ही कुछ सीपियाँ उठा लाया था, भीगी रेत पर चलते-चलते। कुछ मोती भरी थीं और कुछ खाली, किंतु हर एक ने मुझ से अपनी कहानी कही।याद के समदंर से उठा लाया हूँ कुछ सीपियाँ ।लहरों ने छुआ था इन्हें, दम तोड़ने से पहले ।।प्रस्तुत संकलन तीन भागों में विभाजित है। पहले कुछ कविताँए और फिर गज़लें एवं अतं में चंद शेर । गज़लों की बोली उर्दू है और लिखाई हिंदी में | जैसा कि शायर ‘गुलज़ार’ कहते हैं उर्दू अगर दोनो लिपियों में लिखी जाए तो क्या हर्ज है?” वैसे भी मेरे लिए सबसे जरूरी है अपनी भावनाओं, अपने विचारों की अभिव्यक्ति । अब चाहे वह कविता बनकर फूटे या फिर गज़ल के रूप में कल कल बहे । अक्सर विचार खुद ही अपनी शक्ल सूरत बनाते है और अपनी सुविधानुसार कभी गज़ल और कभी कविता बन जाते हैं। मुझे विश्वास है, कि इन रचनाओं में पढ़ने वालों को अपने भीतर गूंजते संगीत की झलक मिलेगी और शायद लहरों के शोर के बीच सुनने को मिले, किसी खाली सीपी के भीतर छुपा सन्नाटा और खालीपन....

ISBN
9789355944429
Språk
engelska
Utgivningsdatum
2004-06-30
Sidor
160
Tillgängliga elektroniska format
  • Epub - Adobe DRM
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